Saturday, July 7, 2012

ब्रिटेन नहीं भारत में बसती हैं मैकॉले की संतानें


अंग्रेजों ने भारत में करीब 250 साल राज किया। उनकी स्पंज रूपी व्यवस्था ने सदियों तक गंगा के किनारे से धन सोखकर टेम्स के किनारे निचोड़ा। भले ही अपने फायदे के लिए सही, लेकिन कई चीजों का विकास भी किया - मसलन रेलवे। उन्होंने कई इमारतें बनवाईं, कई शहरों को बसाया। वहीं राज-काज चलाने के लिए भारत में अंग्रेजी शिक्षा का विकास करना उनकी सबसे बड़ी जरूरत थी। हालांकि इसी शिक्षा ने आगे जाकर आधुनिक समाज की नींव रखी। हमारे यहां क्रांति का आगाज किया। लेकिन आजादी के बाद हम बौद्धिक रूप से उन्हीं के नक्शेकदम पर चलने के लिए बाध्य हो गए। आज हमारी आत्मा भले ही भारतीयता के रंग में रंगी हो, लेकिन चाल-ढाल अंग्रेजी ताने-बाने में बुनी है।

1828 में उदारवादी लॉर्ड विलियम बैंटिक भारत का गवर्नर जनरल बना। राजा राममोहन राय के प्रयासों से उसने सती प्रथा का अंत करके आमूलचूल परिवर्तन किए। इस समय ईस्ट इंडिया कंपनी को अंग्रेजी जानने वाले लोगों की जरूरत महसूस हुई, लेकिन हरेक को अंग्रेजी सिखा दी जाए, यह संभव नहीं था। भारत कोअंग्रेजियतमें ढालने की जिम्मेदारी लॉर्ड मैकॉले को दी गई, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया भी। 1835 में मैकॉले ने अपना एकमिनट’ (लेख) प्रस्तुत किया, जिसमें बताया कि भारत में कैसे अंग्रेजी जानने वालों को तैयार किया जाए। यह शिक्षा का अधोमुखी सिद्धांत था कि चंद लोगों को अंग्रेजी सिखाई जाए, उनसे नॉलेज और लोगों तक भी पहुंच जाएगा। यहां तक तो सब ठीक लगता है, लेकिन असल में मैकॉले की सोच कुछ और ही थी। वह भारतीयता से नफरत करता था। वह भारत के अंदर एक ऐसेभारतका निर्माण करना चाहता था, जो हमारे साथ रहकर हमसे अलग हो। उसका कहना था कि मैं वो दिन ला दूंगा कि भारतीय, भारतीय पर हंसेगा। मैं यहां की हिंदुस्तानी संस्कृति में अंग्रेजियत की सेंध लगा दूंगा। आने वाली शताब्दियों में यहां कोई धोती पहने, त्रिपुंड लगाए, चोटी धारण किए हुए नहीं दिखेगा। और जो ऐसा करेगा भी, उस पर लोग हंसेंगे। ब्रिटिश महारानी का वर्चस्व कायम देखने वालों की भी यही मंशा थी। ईस्ट इंडिया कंपनी के कारिंदों ने तो बस भारत में हुकूमत करने और यहां से धन लूटने की सोची, लेकिन मैकॉले ने तो आने वालीभारतीयपीढिय़ों की रगों मेंअंगे्रजीलहू बहाने का प्रस्ताव तैयार कर लिया था। अंग्रेजों को शासन चलाने के लिए अंग्रेजियत में रचे-बसे अफसर भी चाहिए थे। इसके लिए उन्होंने सिविल सेवा ईजाद की। पहले सिविल सेवा के पर्चे इंग्लैंड में होते थे। ब्रिटिश दौर में बनने वाले सिविल सेवक उनके बाद भी पूरी तरहसिविलाइज्डबने रहे। आज भी भारत केबाबुओंमें औपनिवेशिकता के सारे गुण देखे जा सकते हैं।

दुर्भाग्य
यह रहा कि जिस अंग्रेजी ज्ञान के बलबूते राजा राममोहन राय भारतीयों को दुनिया से वाकिफ कराना चाहते थे, अंग्रेजी के दम से ही अंग्रेजों को नकेल डालना चाहते थे, वह मंसूबा मैकॉले ने ध्वस्त कर दिया। धीरे-धीरे रसूखदारों को भारतीय परंपरा की जगह ब्रिटिश नफासत पसंद आने लगी। ये लोग नाम के भारतीय रह गए, उनकी आत्मा यूनियन जैक के रंग में रंग चुकी थी। आजादी के बाद जब देश विकास की बाट जोह रहा था, तब इन नफासतपसंदों की संतानें पूरी तरह अंग्रेजियत को ओढ़ चुकी थीं। एक अलग वर्ग तैयार हो चुका था, जो गरीब परंपरावादी समाज को हिकारत से देखता था। आर्थिक उदारवाद की आंधी ने मैकॉले की सोच कोपरलगा दिए। आज का युवा हिंदी शब्द, भारतीय परंपरा, ठेठ हिंदुस्तानियत से नावाकिफ है। मैकॉले की सोच को साकार होने में 150 साल भी नहीं लगे। दुख तो इस बात का है कि जिस भारतीय वेद और वेदांत (उपनिषद) को पढ़कर मैडम ब्लावैट्स्की और एनी बेसेंट ने ब्रह्म में आस्था जताई, उन्हीं स्रोतों को हम खुद से दूर करते चले गए।

atul.tiwari@dainikbhaskargroup.com

भास्कर
ब्लॉग... अतुल तिवारी

जिस
अंग्रेजी ज्ञान के बलबूते राजा राममोहन राय भारतीयों को दुनिया से वाकिफ कराना चाहते थे, वह मंसूबा मैकॉले ने ध्वस्त कर दिया।


7 july 2012

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siddharam patil photo

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