Saturday, May 25, 2013

चीन से विवादों का स्थायी हल जरूरी

वेदप्रताप वैदिक | May 24, 2013, 08:11AM IST
प्रधानमंत्री ली केकियांग की यात्रा में सीमा का सवाल, व्यापार असंतुलन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे अनसुलझे रहे।

अगर ली अपने बयानों में कहीं यह भी कह देते कि वे भारत को सुरक्षा-परिषद का स्थायी सदस्य बनवाने के लिए कटिबद्ध हैं तो उनकी यह यात्रा ऐतिहासिक हो जाती। वे भारत का कर्ज अदा कर देते।
 चीनी   प्रधानमंत्री ली केकियांग की यह भारत-यात्रा सफल रही, लेकिन इसे ऐतिहासिक कैसे कहें? उन्होंने अपने भाषण में खुद इस मुद्दे पर जोर दिया कि प्रधानमंत्री बनने के बाद वे सबसे पहले भारत आए। उनकी बात शाब्दिक स्तर पर तो ठीक है, लेकिन यह तब और भी ठीक होती, जबकि वे सिर्फ भारत आते। कहीं और न जाते। लेकिन वे पाकिस्तान भी गए हैं और कुछ यूरोपीय देशों में भी। इस लंबी यात्रा में भारत पहला पड़ाव है। उसे लांघकर वे जाते तो क्या वह अच्छा होता? उन्होंने नहीं लांघा। यह अच्छा किया।
 चीनी सैनिकों के भारतीय सीमा में घुस आने के कारण भारत में अचानक चीन-विरोधी लहर फैल गई थी। भारत-चीन तनाव का चीनी जनमत पर तो कोई खास असर नहीं पड़ा, लेकिन भारतीय जनता और खबरपालिका (मीडिया) इतनी अधिक उत्तेजित थीं कि चीनी प्रधानमंत्री की यात्रा के प्रति कोई आकर्षण ही नहीं रह गया था। 
 यदि दोनों प्रधानमंत्रियों के संयुक्त पत्रकार-सम्मेलन में प्रश्न पूछने की सुविधा होती तो भारतीय पत्रकार चीनी प्रधानमंत्री से पूछ सकते थे कि ऐसा क्यों होता है कि जब भी कोई बड़ा चीनी नेता भारत आता है तो उसके कुछ दिन पहले सीमांत पर गड़बड़ी हो जाती है। क्या चीनी सरकार का चीनी फौज पर नियंत्रण नहीं है? सरकार एक तरफ दोस्ती का दम भरती है और दूसरी तरफ सेना दुश्मनी का खम ठोकती है? या फिर यह फौज और सरकार की मिलीभगत होती है? अगर ऐसा है तो भारत के प्रति चीन की नीति शुद्ध दादागिरी की है।
पहले दादागिरी दिखा दी और जब सामने वाला गिड़गिड़ाया तो तंबू वगैरह हटा लिए। अब भी ली केकियांग ने जो सीमा-संबंधी आश्वासन दिया है, उसमें नया क्या है? इस तरह के समझौते और वार्ताएं पहले भी कई हो चुकी हैं, लेकिन सीमा-विवाद के स्थायी समाधान के बारे में इस यात्रा से कुछ नहीं निकला।
 हमारे प्रधानमंत्री ने सीमा-विवाद को दोनों देशों के संबंधों में बाधक बताकर ठीक किया, लेकिन दोनों प्रधानमंत्रियों ने इस मामले में कोई ठोस निर्णय नहीं लिया। दोनों ने उसे अफसरी बातचीत के गलियारे में सैर करने के लिए छोड़ दिया। चीन यदि सचमुच भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर 21वीं सदी को एशिया की सदी बनाना चाहता है तो उसे यह सीमा-विवाद एक झटके में तुरंत हल करना चाहिए। सीमा-विवाद ही क्या वह एकमात्र बड़ा कारण नहीं है, जिसने दोनों देशों के हजारों वर्षो के संबंधों में जहर घोल दिया था?
 अगर ली अपने बयानों में कहीं यह भी कह देते कि वे भारत को सुरक्षा-परिषद का स्थायी सदस्य बनवाने के लिए कटिबद्ध हैं तो उनकी यह यात्रा ऐतिहासिक हो जाती। वे भारत का कर्ज अदा कर देते। चीन को संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनवाने में जवाहरलाल नेहरू ने कितना जोर लगाया था। हीगल, मेक्स वेबर और मार्क्‍स को उद्धृत करने वाले ली को क्या ये तथ्य याद नहीं हैं? चलिए यह नहीं सही, ली इतना ही कर देते कि जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बता देते और भारत-चीन सीमा को चार हजार किमी की मान लेते। अभी तो चीन जम्मू-कश्मीर यानी लद्दाख की सीमा को पाकिस्तान की सीमा मानता है।
 यदि ली पाकिस्तान को भारत के मुकाबले खड़ा करने की नीति पर ही पुनर्विचार के संकेत दे देते तो उनकी यह यात्रा अपूर्व हो जाती। इसके बदले उन्होंने बड़ी तरकीब से काम लिया। उन्होंने संयुक्त बयान में यह लिखवा लिया कि दोनों देशों के आपसी संबंधों में किसी तीसरे देश से उनके संबंध आड़े नहीं आएंगे। यानी पाकिस्तान से चीन के संबंधों पर भारत को कोई आपत्ति नहीं होगी और अमेरिका से भारत के संबंधों पर चीन को कोई आपत्ति नहीं होगी। क्या खूब? पाकिस्तान और अमेरिका को आपने एक ही पलड़े पर रख दिया। अच्छा हुआ कि तिब्बत के मामले ने तूल नहीं पकड़ा। संयुक्त बयान में जैसे तिब्बत नहीं आया तो ताईवान भी नहीं आया। 
 यह ठीक है कि दोनों देशों ने आपसी व्यापार को 100 बिलियन डॉलर तक बढ़ाने का संकल्प लिया और उसके लिए कुछ नई कार्य-योजनाएं भी बनाई हैं, लेकिन इधर जो व्यापार का संतुलन बिगड़ता जा रहा है, भारत में जो 30 बिलियन डॉलर का आयात ज्यादा हो रहा है, क्या उसे बराबर करने का भी कोई रास्ता निकाला गया है? भारत का कच्चा लोहा मिट्टी के मोल चीन जाता है और वह इस्पात के मोल भारत में बिकता है, क्या यह ब्रिटिश उपनिवेशवाद की पुनरावृत्ति नहीं है? भारतीय माल से चीनी बाजार कैसे पाटे जाएंगे, यह रणनीति कब बनेगी? नदी पर बंधने वाले चीनी बांधों के बारे में समझौते से यह आशा बंधती है कि अब भारत के लाखों लोग हर साल बाढ़ से कम पीड़ित होंगे।
 
कैलाश-मानसरोवर के यात्रियों के लिए बेहतर सुविधाएं देने के चीन के आश्वासन का स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन क्या चीन के शासकों से हमारा यह पूछना नाजायज है कि वे तिब्बतियों पर थोड़ा रहम क्यों नहीं खाते? भारत के नेता, पता नहीं, तिब्बत के मामले में दब्बू क्यों बने रहते हैं। हम तो तिब्बत को चीन का हिस्सा मान ही चुके हैं। ऐसे में हम चीन से यह क्यों नहीं कहते कि आप हम पर शंका मत कीजिए। तिब्बत का मसला हल करने में हम आपकी मदद करेंगे। 
 ली की इस यात्रा के दौरान जो आठ समझौते हुए हैं, इनमें एक समझौता ध्यान देने लायक है। 25 उत्कृष्ट ग्रंथों का हिंदी और चीनी में अनुवाद करने का संकल्प है। यह भारत और चीन के हजारों वर्षो के सांस्कृतिक संबंधों को पुनर्जीवित करने का प्रयत्न है। पेइचिंग विश्वविद्यालय के कई दशकों से समर्पित दो हिंदी विद्वानों के निधन से जो क्षति हुई है, उसकी पूर्ति कुछ हद तक इस समझौते से होगी।
 अच्छा होता कि अगले पांच वर्षो में दोनों देशों के पांच-पांच हजार बच्चों को हिंदी और चीनी सिखाने की भी योजना बनती। इससे आपसी व्यापार तो बढ़ता ही, सांस्कृतिक संबंध भी घनिष्ठ होते। अभी जितने समझौते हुए हैं, यदि दोनों सरकारें उन पर ईमानदारी से काम करती रहीं तो आपसी संबंध मधुर तो होंगे ही, पारस्परिक संदेह भी घटेंगे।

वेदप्रताप वैदिक
प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक

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