Wednesday, August 22, 2012

पत्रकारितेला काळिमा फासणारा पत्रकार - राजदीप

(एक हजार हिन्दुओं का कत्ल करो – राजदीप सरदेसाई)
संजीव कुमार सिन्‍हा

राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार मुस्लिमपरस्त क्यों होते हैं?
(एक हजार हिन्दुओं का कत्ल करो – राजदीप सरदेसाई)


विष्णुगुप्त
आईबीएन सेवन के चीफ राजदीप सरदेसाई की असम दंगे पर एक खतरनाक, वीभत्स, रक्तरंजित और पत्रकारिता मूल्यों को शर्मसार करने वाली टिप्पणी से आप अवगत नहीं होना चाहेंगे? राजदीप सरदेसाई ने असम में मुस्लिम दंगाइयों द्वारा हिन्दुओं की हत्या पर खुशी व्यक्त करते हुए सोसल साइट ‘टिवट्‘ पर टिवट किया कि जब तक असम दंगे में एक हजार हिन्दू नहीं मारे जायेंगे तब तक राष्ट्रीय चैनलों पर असम दंगे की खबर नहीं दिखायी जानी चाहिए और हम अपने चैनल आईबीएन सेवन पर असम दंगे की खबर किसी भी परिस्थिति में नहीं दिखायेंगे ?
अपनी इस टिप्पणी पर बाद में राजदीप सरदेसाई ने माफी मांगी पर उनकी असली मानसिकता और देश के बहुसंख्यक संवर्ग के प्रति उनकी घृणा प्रदर्शित करता है। क्या किसी पत्रकार को इस तरह की टिप्पणी करने या फिर मानसिकता रखने का कानूनी अधिकार है? क्या इस करतूत को दंगाइयों को उकसाने का दोषी नहीं माना जाना चाहिए। कानून तो यही कहता है कि ऐसी टिप्पणी करने वाले और मानसिकता रखने वाले को दंडित किया जाना चाहिए ताकि देश और समाज कानून के शासन से संचालित और नियंत्रित हो सके। पर सवाल यह उठता है कि राजदीप सरदेसाई को दंडित करेगा कौन?
हिन्दुओं की हत्या करने के लिए मुस्लिम दंगाइयों को उकसाने वाली टिप्पणी पर राजदीप सरदेसाई से सवाल पूछेगा तो कौन? सत्ता, पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिक तक हिन्दुओ के प्रसंग पर उदासीनता की स्थिति में होती है। ऐसा इसलिए होता कि सत्ता, पुलिस, प्रशासन, न्यायपालिका को मालूम है कि हिन्दु अपनी अस्मिता व अपने संकट को लेकर एकजुट होंगे नहीं और न ही हिंसा का मार्ग अपनायेंगे और मतदान के समय जाति और क्षेत्र के आधार पर मुस्लिम परस्त राजनीतिक पार्टियो के साथ खड़े होने की मानसिकता कभी छोंडेगे नहीं? फिर संज्ञान लेने की जरूरत ही क्या? इसीलिए राजदीप सरदेसाई की टिप्पणी पर न तो सरकार कोई कदम उठायी और न ही गुजरात दंगा पर गलत-सही सभी तथ्यो पर लेने वाली न्यायपालिका ने स्वतह संज्ञान लिया। हिन्दू संवर्ग की ओर से गंभीर प्रतिक्रिया का न होना भी अपेक्षित ही है। ऐसी स्थिति में हिन्दू अस्मिता भविष्य में भी अपमानित होती रहेगी और हिन्दुओं को तथाकथित अल्पसंख्यक मुस्लिम जेहादियों का शिकार होना पडे़गा। यहां विचारणीय विषय यह है कि क्या असम दंगा के लिए बोड़ो आदिवासी जिम्मेदार है? बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुस्लिम जेहाद के प्रति राष्ट्रीय मीडिया क्यों और किस स्वार्थ के लिए उदासीनता पसारती है?

अगर यह टिप्पणी मुस्लिम आबादी के खिलाफ होती तब होता क्या?
अगर एक हजार हिन्दुओं की हत्या करने के लिए मुस्लिम दंगाइयों को उकसाने वाली टिप्पणी की जगह राजदीप सरदेसाई ने एक हजार मुस्लिम आबादी की हत्या करने वाली टिप्पणी की होती तब होता क्या? फिर देश ही नहीं बल्कि मुस्लिम देशों सहित पूरी दुनिया में तहलका मच जाता। पाकिस्तान, ईरान, सउदी अरब,मलेशिया, तुर्की और लेबनान जैसे मुस्लिम देश भारत को धमकियां देना शुरू कर देते। भारत में मुस्लिम सुरक्षित नहीं है कि खतरनाक कूटनीति शुरू हो जाती। अलकायदा जैसे सैकड़ो मुस्लिम आतंकवादी संगठन भारत के खिलाफ जेहाद शुरू कर देते। अमेरिका-यूरोप के मानवाधिकार संगठन भारत में मुसलमानों की सुरक्षा को लेकर आग उगलना शुरू कर देते। यह तो रही मुस्लिम और अमेरिका-यूरोप की ओर से उठ सकने वाली प्रतिक्रिया। देश के अंदर मुस्लिम आबादी धरने-प्रदर्शन की बाढ़ ला देती। मुस्लिम नेता और संगठन सड़कों पर उतर जाते। तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग आसमान सर पर उठा लेते और सरकार से टिप्पणीकर्ता व्यक्ति को जेल में डालने की न केवल मांग करते बल्कि सरकार की आलोचना से भी पीछे नहीं हटते। क्या इतनी आलोचना और धमकियों को भारत सरकार झेल पाती ? उत्तर है कदापि नहीं। मुस्लिम आबादी को संतुष्ट करने के लिए टिप्पणीकर्ता को आतंकवादी धाराओ के अंदर जेल में ठूस दिया जाता। ऐसी स्थिति में राजदीप सरदेसाई के चैनल पर भी ताला लग गया होता? शेयरधारक और राजदीप सरदेसाई के विदेशी गाॅडफादर चैनल से अपनी हिस्सेदारी वापस लेने के लिए तैयार हो जाते । राजदीप सरदेसाई जेल की काल कोठरी में कैद हो जाते।
गोधरा भूल क्यों जाते हैं?
गुजरात दंगे को लेकर राजदीप सरदेसाई सहित राष्ट्रीय मीडिया और तथाकथित बुद्धिजीवी संवर्ग हिन्दुओं को आतंकवादी साबित करने की कोई कसर नहीं छोड़ते। गुजरात दंगो का मनगढंत व अतिरंजित प्रसारण व लेखन हुआ है। माना कि गुजरात दंगा जैसी प्रतिक्रिया नहीं होनी चाहिए। लेकिन जब गुजरात दंगे की बात होती है और राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार गुजरात दंगे की बात करते हैं तब गोधरा नरसंहार को क्यों भुला दिया जाता है। निहत्थे कारसेवकों की हत्या क्यों नहीं इन पत्रकारों को दिखता है। गुजरात दंगों की एक बहुत बड़ी सच्चाई यह है कि जिस तरह से राष्ट्रीय मीडिया ने गोधरा कांड के बाद हिन्दुओं को ही आतंकवादी और जेहादी बताने की पूरी कोशिश की थी। कारसेवकों का नरसंहार करने वाले मुस्लिम जेहादियों की पड़ताल करने की जरूरत महसूस नहीं की गयी कि इनके प्रेरणास्रोत मजहबी संगठन कौन-कौन है? गोधरा कांड की साजिश के पीछे की सच्चाई क्या थी। अगर राष्ट्रीय मीडिया और तथाकथित बुद्धिजीवी जमात ने संयम बरतते और हिन्दुओं को आक्रोशित नहीं करते तब गुजरात में मुस्लिम आबादी के खिलाफ उतनी बड़ी प्रतिक्रिया होती नहीं। मुस्लिम आबादी के प्रति गुस्सा जगाने का गुनहगार राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार और उनके चैनल हैं।
असम दंगा बंग्लादेशी मुसलमानों की है करतूत…
खासकर बोड़ो आदिवासियों की अस्मिता और उनके जीने के संसाधनों पर मजहबी जेहाद चिंताजनक है। असम दंगा के लिए आॅल बोड़ो मुस्लिम स्टूडेंट यूनियन को दोषी माना गया है। बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद के उप प्रमुख खम्मा गियारी ने साफतौर पर कहा है कि असम के बोडोलैंड में जारी हिंसा के लिए आॅल बोड़ो मुस्लिम स्टूडेंट यूनियन की मजहबी मानसिकता जिम्मेदार है और आॅल बोड़ो मुस्लिम स्टूडेंट यूनियन की मजहबी मानसिकता के पोषक तत्व विदेशी शक्तियां हैं। असम के लोग यह जानते हैं कि आॅल बोड़ो मुस्लिम स्टूडेंट यूनियन की गतिविधियां क्या हैं और इनका असली मकसद क्या हैं? बांग्लादेशी घुसपैठियों का यह संगठन है। बांग्लादेश से घुसपैठ कर आयी आबादी ने अपनी राजनीतिक सुरक्षा और शक्ति के संवर्द्धन के लिए मुस्लिम स्टूडेंट यूनियन सहित कई राजनीतिक व मजहबी शाखाएं गठित की है। मुस्लिम स्टूडेंट यूनियन का काम शिक्षा का प्रचार-प्रसार या शिक्षा से जुड़ी हुई समस्याएं उठाने की नहीं रही है। उनका असली मकसद मजहबी मानसिकता का पोषण और प्रचार-प्रसार रहा है। इसके अलावा बांग्लादेश से आने वाली मुस्लिम आबादी को बोड़ोलैंड सहित अन्य क्षेत्रों में बसाना और उन्हे सुरक्षा कवच उपलब्ध कराना है। बोड़ोलैंड क्षेत्र की मूल आबादी के खिलाफ लव जेहाद जैसी मानसिकता भी एक उल्लेखनीय प्रसंग है। जिसके कारण बोड़ोलैंड की मूल आबादी और मुस्लिम संवर्ग के बीच तलवार खिंची हुई है। बांग्लादेश से आने वाली आबादी के कारण बोड़ोलैंड की आबादी अनुपात तो प्रभावित हुआ है और सबसे खतरनाक स्थिति यह है कि बोड़ोलैंड का परंपरिक रीति-रिवाज और अन्य संस्कृतियां खतरे में पड़ गई हैं।
असम दंगा मुस्लिम आबादी की करतूत नहीं होती तब ?
असम दंगे में मुस्लिम स्टूडेंट यूनियन और बांग्लादेशी घुसपैठिये आबादी की भूमिका स्थापित होने और हताहतों में बोड़ोलैंड की मूल आबादी की संख्या अधिक होने के कारण ही राष्ट्रीय मीडिया ने उदासीनता पसारी और इतनी बड़ी आग पर चुप्पी साधने जैसी प्रक्रिया अपनायी। अगर मुस्लिम स्टूडेंट यूनियन और बांग्लादेशी मुस्लिम आबादी की दंगाई भूमिका नहीं होती तो राजदीप सरदेसाई सहित राष्ट्रीय मीडिया चीख-चीख कर पूरे देश की जनता को बताता कि देखो असम मे मुस्लिम आबादी के खिलाफ हिन्दुओ ने कत्लेआम किया है, हिन्दू आतंकवादी है और हिन्दुओं से देश की शांति को खतरा है? मीडिया चैनलों पर अरूधंति राय, तिस्ता शीतलवाड़, हर्ष मंदर, जावेद आनंद और दिलीप पड़गावरकर जैसे पत्रकार व एक्टिविस्ट बैठकर और प्रिंट मीडिया में काॅलम लिख कर हिन्दुओं को आतंकवादी और दंगाई ठहराने की कोई कसर नहीं छोड़ते। पर असम दंगे पर अरूंधति राय, तिस्ता शीतलवाड़, जावेद आनंद, दिलीप पंड़गावरकर जैसे लोग आज चुप्पी साधे क्यों बैठे हैं? राष्ट्रीय मीडिया और तथाकथित बुद्धीजीवी सिर्फ असम के दंगे पर ही अपनी मुस्लिम परस्ती नहीं दिखायी है। कश्मीर में मुस्लिम आतंकवादियों द्वारा कश्मीरी पंडितों की हत्या और उन्हें अपनी मातृभूमि से बेदखल करने की राजनीतिक कार्रवाई पर राष्ट्रीय मीडिया और तथाकथित बुद्धीजीवी क्या कभी गंभीर हुए हैं। राष्ट्रीय मीडिया और तथाकथित बुद्धीजीवी संवर्ग कश्मीर की आतंकवादियों की हिंसक राजनीति को आजादी की लड़ाई करार देते हैं। कुछ ही दिन पूर्व उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले कोसी कलां क्षेत्र में मुस्लिम आबादी ने हिन्दुओं के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा फैलायी थी। कोसी कलां क्षेत्र में हिन्दुओं पर हुए अत्याचार की घटना उत्तर प्रदेश विधान सभा में उठी पर राष्ट्रीय मीडिया ने मुस्लिम आबादी द्वारा हिन्दुओं के घरों और दुकानों को जलाने जैसी हिंसक घटना को साफतौर पर ब्लैक आउट कर दिया था। अभी हाल ही में बरेली में कांवरियों के साथ मुस्लिम आबादी ने बदसूलकी की और दंगा फैलायी गयी। कई दिनों तक बरेली में कर्फयू लगा रहा। पर राष्ट्रीय मीडिया बरेली में कर्फयू और कांवरियों के साथ हुई बदसूलकी को ब्लैक आउट कर दिया।
जनसांख्यिकी असंतुलन पर मीडिया का संज्ञान क्यों नहीं….
राष्ट्रीय मीडिया और सरकार असम की खतरनाक होती जनसांख्यिकी समस्या को नजरअंदाज करती आयी है। जबकि जरूरत जनसंाख्यिकी संतुलन पर गंभीरता से विचार कर घुसपैठ की समस्या पर रोक लगाने की थी। असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण आबादी का अनुपात तेजी से अनियंत्रित हो रहा है। असम के कई जिले बांग्लादेशी मुस्लिम आबादी की बहुलता के चपेट में आ गये हैं। बांग्लादेशी मुस्लिम आबादी ने अपनी राजनीतिक स्थिति भी मजबूत कर ली है। कभी बांग्लादेशी मुस्लिम आबादी के खिलाफ असम में छात्रो का एक बड़ा विख्यात अभियान और आंदोलन चला था। छात्रों के इसी अभियान की गोद से असम गण परिषद और प्रफुल मंहत जैसे राजनीतिक ताकत का जन्म हुआ था। दुर्भाग्य से असम गण परिषद खुद हासिये पर खड़ा है और बांग्लादेशी मुस्लिम आबादी की घुसपैठ का सवाल भी अब बे अर्थ होता चला जा रहा है। कांग्रेस वोट और सत्ता के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों क¨ संरक्षण देती है। असम में कांग्रेसी की सरकार शह और संरक्षण के कारण ही मुस्लिम आबादी की दंगायी और मजहबी मानसिकता का विस्तार हो रहा है। असम की कांग्रेसी सरकार द्वारा बोड़ोलैंड में हुए दंगों पर कड़ाई नहीं दिखाने के प्रति कारण भी यही है।
राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार मुस्लिम परस्त क्यो होते हैं…
राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार मुस्लिम परस्त क्यों होते हैं? राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार हिन्दू अस्मिता को अपमानित करने के लिए क्यों उतारू होते हैं? मुस्लिम आतंकवादियों और कश्मीर के राष्टद्रोहियांे की चरण वंदना क्यों करते हैं राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार? इसके पीछे करेंसी का खेल है। पैसे के लिए व विदेशी दौरे हासिल करने के लिए देश के पत्रकार और बुद्धिजीवी हिन्दुत्व के खिलाफ खेल-खेलते हैं और देश की अस्मिता को अपमानित करने जैसी राजनीतिक-कूटनीतिक प्रक्रिया अपनाते हैं। फई प्रसंग आपको याद नहीं है तो मैं याद करा देता हूं। फई आईएसआई का एजेंट है। फई के इसारे पर भारतीय पत्रकार और बुद्धिजीवी लट्टू की तरह नाचते थे। फई पर अमेरिका में आईएसआई एजेंट होने के आरोप में मुकदमा चल रहा है। फई के पैसे पर बडे़-बड़े पत्रकार राज करते थे और फई द्वारा भारत विरोधी सेमिनारों के आयोजन मे अमेरिका जाकर ऐस-मौज करते थे। फई के पैसे और फई के प्रायोजित अमेरिकी दौरे पर जाने वाले पत्रकारों में कुलदीप नैयर जैसे पत्रकार भी रहे हैं। राष्ट्रीय मीडिया के बड़े स्तंभों में कहीं आईएसआई या फिर मुस्लिम जेहादियों का पैसा तो नहीं लगा है? ईरान-सउदी अरब सहित यूरोप के मुस्लिम संगठनों से भारत को इस्लामिक देश में तब्दील करने के लिए अथाह धन आ रहा है। अथाह धन मुस्लिम आबादी के पक्ष में खड़ा होने के लिए मीडिया पर खर्च नहीं हो रहा होगा? मीडिया को अपने वीभत्स, रक्तरंजित स्वार्थों के लिए हथकंडा के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अलकायदा जैसे संगठनों ने सबसे पहले मीडिया को ही अपना चमचा बनाया था। कश्मीर में आतंकवादियों की जमात ‘हुर्रियत ‘ की सबसे बड़ी ताकत देश का राष्ट्रीय मीडिया ही है। यह एक सच्चाई है। हुर्रियत को आईएसआई और विदेशों से आतंकवादी और भारत विरोधी अभियान चलाने के लिए धन मिलता है। हुर्रियत के नेता अपने मजहबी स्वार्थो की पूर्ति के लिए राष्ट्रीय मीडिया को करेंसी की ताकत लट्टू की तरह नचाते हैं।
स्वयं भू निगरानी संगठन मौन क्यों हैं?
राजदीप सरदेसाई ने एक हजार हिन्दुओं की कत्ल करने के लिए जो टिप्पणी की थी वह क्या पत्रकारिता मूल्यो के अनुरूप थी? पत्रकाकारिता सिद्धंातों की कसौटी पर लोकतांत्रिक माना जाने वाली थी? राजदीप सरदेसाई की टिप्पणी सीधे तौर पर पत्रकारिता के मूल्य व सरोकारों को शर्मशार करने वाली घटना थी। देश के अंदर में कुकुरमुत्ते की तरह पत्रकारों के संगठन है। कई ऐसे संगठन हैं जो पत्रकारों और पूरे मीडिया पर निगरानी करने का दावा करते हैं? इलेक्‍ट्रॉनिक्स मीडिया का स्वयं भू एक निगरानी संगठन है। इलेक्‍ट्रॉनिक्स मीडिया के स्वयं भू निगरानी संगठन में बड़े-बड़े पत्रकार और सभी चैनलों के प्रमुख सदस्य हैं। यह निगरानी संगठन इलेक्‍ट्रॉनिक्स मीडिया को लोकतांत्रिक बनाने और तथ्यहीन कवरेज पर नोटिस लेता है। राजदीप सरदेसाई की टिप्पणी पूरे पत्रकार जगत को शर्मशार करने वाली है। पत्रकारिता की विश्वसनीयता भी तार-तार हुई। फिर भी इलेक्‍ट्रॉनिक्स मीडिया का स्वयं भू निगरानी संगठन चुप क्यों है। यही निगरानी संगठन इलेक्‍ट्रॉनिक्स मीडिया पर नजर रखने के लिए सरकारी नियामक का विरोधी रहा है। राजदीप प्रकरण के बाद इलेक्‍ट्रॉनिक्स मीडिया पर नजर रखने और इलेक्‍ट्रॉनिक्स मीडिया के गैर लोकतांत्रिक चरित्र पर रोक लगाने के लिए सरकारी नियामक का होना क्यों जरूरी नहीं है? प्रेस परिषद अध्यक्ष न्यायमूर्ति काटजू के इलेक्टानिक्स मीडिया पर सरकारी नियामक बनाने के विचार को मूल रूप देने की प्रक्रिया चलनी ही चाहिए।
अति का परिणाम भी देख लीजिये………………
अति बहुत ही खतरनाक प्रक्रिया है? अति का परिणाम कभी भी सुखद निकलता नहीं? हिन्दुओं की अस्मिता से खेलने की जो पीत पत्रकारिता चल रही है, राजनीतिक खेल जारी है, उसके परिणाम गंभीर होंगे। अगर मुस्लिम आबादी की तरह हिन्दू आबादी भी अपनी परम्परागत उदारता को छोड़कर मुस्लिम विरोध की पराकाष्ठ पर उतर आयेगी तब स्थितियां कितनी खतरनाक होगी, कितनी जानलेवा होगी? इसकी कल्पना शायद राजदीप सरदेसाई जैसे बिके हुए पत्रकार नहीं कर सकते हैं। गुजरात दंगा अतिवाद के खिलाफ उपजा हुआ हिन्दू आबादी का आक्रोश था। गुजरात की तरह ही हिन्दू आबादी देश के अन्य भागो में भी एकजुट होकर मुस्लिम आबादी के खिलाफ वैमनस्य और तकरार का रास्ता चुन लिया तो फिर मुस्लिम आबादी के सामने कैसी भयानक स्थिति उत्पन्न होगी? इसकी कल्पना होनी चाहिए। क्या राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार गुजरात दंगा हिन्दुओ के आक्रोश को रोक सके थे। सही तो यह है कि राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार जेहादी मानसिकता का पोषण कर मुस्लिम आबादी को संकट में ही डाल रहे हैं। मुस्लिम आबादी की दंगाई मानसिकता का प्रबंधन होना भी क्यों जरूरी नहीं है?
निष्कर्ष
सही अर्थो में दंगाई मानसिकता और चरमपंथ की व्याख्या होनी चाहिए। एकांगी व्याख्या या फिर एकांगी दृष्टिकोण रखने से दंगायी मानसिकता व चरम पंथ को विस्तार ही मिलेगा। मुस्लिम आबादी की दंगायी मानसिकता और उनका चरमपंथ भी कम खतरनाक नहीं है। इस सच्चाई से राष्ट्रीय मीडिया को मुंह नहीं मोड़ना चाहिए। असम ही नहीं पूरा पूवोत्तर क्षेत्र आज विदेशी ताकतों और मजहबी शक्तियों की चपेट में है। राष्ट्रीय मीडिया ने असम दंगे पर प्रारंभिक चुप्पी साधकर अपने कर्तव्य से न्याय नहीं किया है। क्या राष्ट्रीय मीडिया चरमपंथ और दंगाई मानसिकता का सही अर्थों में विश्लेषण करने के लिए तैयार होगा? क्या राष्ट्रीय मीडिया राजदीप सरदेसाई जैसी मानसिकता से मुक्त होने के लिए तैयार है। फिलहाल असम में दंगायी आग को बुझाने और दंगाइयो को गुजरात दंगे की तरह ही कानून व सवंधिान का पाठ पढ़ाने की जरूरत है। राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकारों को भी लोकतांत्रिक बनाने के लिए सरकारी नियामकों का सौंटा चलना चाहिए।(संवाद मंथन)
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(लेखक मूल रूप से समाजवादी चिंतक हैं। समाजवादी और झारखंड आंदोलन सक्रिय भूमिका रही है। पिछले 25 सालों से हिन्दी पत्रकारिता के योद्धा हैं। ‘झारखंड जागरण‘ रांची, ‘स्टेट टाइम्स‘ जम्मू और न्यूज एजेंसी एनटीआई के संपादक रह चुके है। वर्तमान में वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार है।)

2 जनवरी, 1978 को पुपरी, बिहार में जन्म। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक कला और गुरू जंभेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में स्नातकोत्तर की डिग्रियां हासिल कीं। दर्जन भर पुस्तकों का संपादन। राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर नियमित लेखन। पेंटिंग का शौक। छात्र आंदोलन में एक दशक तक सक्रिय। जनांदोलनों में बराबर भागीदारी। मोबाइल न. 9868964804 संप्रति: संपादक, प्रवक्‍ता डॉट कॉम
 

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